Thursday, April 30, 2009

आरंभ

"आरंभ है प्रचंड  
बोले मस्तकों के झुंड 
आज जंग की घड़ी की तुम गुहार दो"  
आज से मैने भी कुछ लिखना शुरू किया है. पता नही ये कब तक चलेगा...... पता नही मुझे जाननेवाले कैसी प्रतिक्रिया देंगे, क्यूंकी मैं अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए नही जाना जाता हूँ. जिसका कभी नुकसान भी होता है और कभी फ़ायदा भी होता है............. लेकिन आदमी को कभी कभी लाभ-हानि से परे हो कर भी कुछ कर लेना चाहिए. शायद इसीलिए मैने अपने ब्लॉग का टाइटल रखा है "अभिव्यक्ति की जीत". क्यूंकी मैं जनमत पे अपने प्रयास को नही तोलना चाहता हूँ. इसीलिए मैं ने अपने आपको पहले से ही विजेता घोषित कर दिया है. और ये मेरा 'ओवर-कॉन्फिडेन्स' नही है. ये मैने अपने आस पास की घटनाओं से ही सीखा है. इस सन्दर्भ मे आपको एक वाक़या बताना चाहता हूँ जो शायद आप ने पहले से ही सुन रखा हो. इस कहानी को मैं कभी कभी लोगों को समझाने के लिए प्रयोग मे लाता हूँ. अभी कुछ दिन पहले मेरा भाई बहुत ही परेशान था अपने बोर्ड परीक्षा को लेकर. उसे इस बात का डर था की अगर उसने कुछ अच्छा नही किया तो लोग क्या कहेंगे. उसे मैने ये सुनाया था : एक साल.... माफ़ कीजिएगा हर साल हमारे बिहार का उत्तरी भाग जलमग्न होता है. और हमारे मंत्री जी को शायद एक मौका मिल जाता है हेलिकॉप्टर से अपने क्षेत्रा के लोगों को देखने का. तो ऐसे ही एक बार वो हेलिकॉप्टर से निकले जलमग्न लोगों का हाल चाल लेने. कल के समाचार-पात्रा मे विपक्ष के नेता का बयान आया की "देखिए हमारे मंत्री जी को, जनता बाढ़ मे घिरी हुई है और ये हवाई यात्रा का मज़ा ले रहे हैं. इन्हे जनता के दुख का क्या अहसास होगा. अगर इनके दुख को अनुभव करना है तो ज़मीन पे रह के देखे उनके बीच जाके देखें." काफ़ी हंगामा हुआ इस पर. खैर बात आई गयी हो गयी, जैसा की अक्सर हमारे देश मे होता आया है. अगले साल फिर से बाढ़ आई. इस बार मंत्री जी ने सोचा की सड़क यात्रा की जाए. किसी तरह बेचारे बाढ़ ग्रस्त इलाक़े मे दो-तीन दिन मे पहुचे. अगले दिन समाचार पत्र मे फिर उसी विपक्ष के नेता का बयान आया " वाह रे मंत्री जी, यहाँ जनता बाढ़ मे घिरी हुई किसी तरह अपना जीवन यापन कर रही है, और हमारे मंत्री जी 3-4 दिन से सैर पे निकले हुए हैं. इनसे ये ना हो सका कि जल्दी से जल्दी स्थिति का जायज़ा लिया जाए और राहत सामग्री पहुचाने मे शीघ्रता की जाए." कहने का मतलब ये की अगर आप लोगों की प्रतिक्रिया पे अपने प्रयासों से ज़्यादा ध्यान देंगे तो अपने लक्ष्य को पाने मे बहुत मुश्किल हो सकती है. इसीलिए मैने आज लिखना शुरू कर दिया है बिना कुछ सोचे की " लोग क्या कहेंगे".