Wednesday, August 25, 2010

कुछ भोजपुरी गाने

आप यहाँ अब कुछ अच्छे भोजपुरी गाने सुन सकते हैं. दाहिनी तरफ एक MP3 प्लेयर दिखेगा जिसमे मैने २०-२५ गाने डाले हैं जो मुझे अच्छे लगते हैं. आप भी सुनिए और आनंद उठाइए. मैं समय समय पर इसमे कुछ और भी गाने डालता रहूँगा. आशा है आपको भी अच्छा लगेगा.

Saturday, January 2, 2010

३ ईडियट्स 'आल इज़ वेल?'

नये साल की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ इस साल का पहला ब्लॉग आपके सामने रख रहा हूँ. साल के शुरुआत मे ही एक अजीब सी परिस्थिति से पाला पड़ा. ३ ईडियट्स / ५ पॉइंट सम्वन. जहाँ तक मेरी सोच जाती है ये मुद्दा ना तो इसका है कि कौन इस कहानी का मूल कहानीकार है और ना ही इसका कि किसे इसका श्रेय मिलना चाहिए. सवाल है एक परिपक्व सोच की. मैं थोड़ा असमंजस में हूँ कि इस मुद्दे से संबंधित लोग, जिन्हे मैं बहुत ही उम्दा कलाकार की श्रेणी में रखता हूँ , ऐसी परिस्थिति को कैसे उत्पन्न होने दे सकते हैं. मेरा एक बहुत ही साधारण सवाल है की अगर उस फिल्म की शुरुआत में ये दिखाया जाए कि "चेतन भगत की ५ पॉइंट सम्वन से प्रेरित" , तो क्या इस फिल्म से जुड़े लोगों की काबिलियत पे सवाल उठ जाते? वैसे भी सभी लोगों को ये पता था की ये फिल्म उसी किताब पे आधारित है. तो इसके निर्माता किसे धोखा देना चाहते हैं? खैर, अब ये तो उनकी सोच पे निर्भर करता है.....

दूसरा प्रश्न है की क्या ये फिल्म बिना ' ५ पॉइंट सम्वन ' के संभव हो पाती? नहीं. तो फिर कोई भी क्रियेटिव व्यक्ति ये कैसे कह सकता है कि ये एक "ओरिजिनल" कहानी है. आपको नही लगता कि ये उनकी क्रेडिबिलिटी पे एक सवाल उठाता है? अभी कुछ दिन पहले ही एक फिल्म आई थी, 'स्लम्डॉग मिलियनेर'. वो फिल्म भी एक उपन्यास पर आधारित थी, विकास स्वरूप की 'Q & A'. मैने वो उपन्यास भी पढ़ी है और फिल्म भी देखी है. दोनों में सिर्फ़ एक समानता है की दोनों का ढाँचा एक है बाकी सारी चीज़ अलग है. साइमन बेअफ़ौय जिन्होने उस फिल्म की स्क्रीनप्ले तैयार की थी उन्होने कहा था कि 'Q & A' के बिना ये फिल्म और ना ही ये ऑस्कर संभव हो पाता. और ३ ईडियट्स वाले फिल्म की घटनाओं की लिस्ट तैयार कर रहे हैं कि क्या क्या इसमे उपन्यास से अलग है. या तो इन्हें 'अडाप्टेशन' का मतलब ही नही पता है या ये इसे समझना ही नहीं चाहते हैं. यहाँ ये भी कहना होगा की उन्होने इस किताब को फिल्म मे ढालने के लिए बहुत ही उम्दा काम और बदलाव किए हैं. और इसी काबिलियत के तो हम कायल हैं राजकुमार हिरानी और अभिजात जोशी के. लेकिन मुझे अफ़सोस है कि ऐसा करने से भी ये कहानी उनकी नही हो जाती है.....

सबसे खटकने वाली बात ये की शुरुआत में इस मुद्दे से संबंधित सारे सवालों का जवाब आमिर ख़ान दे रहे थे, जिन्होने ये किताब पढ़ी ही नही है. भाई साहब आप इतने बड़े कलाकार हैं , आपके काम को लोग इतना सराहते हैं, इसका मतलब ये तो नही की आप जो बोलेंगे वो सही ही होगी, और वो भी तब जबकि आपको सिर्फ़ एक पक्ष की बात पता है. आप जैसे 'PERFECTIONIST' से ऐसी आशा नहीं थी. और ये हमें एक और वजह देता है शक कि क्यूँ आमिर को सामने लाया गया जबकि वो सही व्यक्ति नही थे इस मुद्दे पे कुछ कहने के लिए. क्या इसके निर्माता उनके पॉपुलर होने को भुनाना चाहते थे?

आशा करता हूँ कि लोगों को बात समझ मे आएगी और अंत मे 'आल इज़ वेल' का प्रश्नचिन्ह मिट जाएगा..........

Monday, November 9, 2009

लापतागंज - शरद जोशी की कहानियों का पता

एक दिन ऐसे ही चॅनेल सर्फ कर रहा था तो एक धारावाहिक से मुलाकात हुई. नाम था "लापतागंज - शरद जोशी की कहानियों का पता"(SAB TV). शरद जोशी हिन्दी के अच्छे व्यंग्यकार के रूप मे जाने जाते हैं. ये धारावाहिक उन्हीं की कहानियों से प्रेरित है. उनकी कहानियाँ समाज के कड़वे सत्य को एक सटीक व्यंग्य के रूप में प्रदर्शित करती है. उनकी कहानियाँ एक तरफ तो आपको अपने चुटीले संवादों से गुदगुदाती हैं, वहीं दूसरी तरफ आपको रोज़मर्रा की परेशानियों पर भी सोचने को मज़बूर करती हैं.

लापतागंज भारत के एक छोटे से क़स्बे की कहानी है जिसे बहुत पहले कहीं खो दिया गया है. यहाँ के लोग अपने रोज़ की बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष करते रहते हैं लेकिन फिर भी यहाँ रहने वाले लोग खुश रहने की कला जानते हैं. ये धारावाहिक यहाँ के लोगों के द्वारा विपरीत परिस्थितियों मे भी खुश रहने के जज़्बे को दर्शाता है. और यही इसकी ख़ासियत है.

आइए मैं यहाँ के कुछ बाशिंदों से आपको मिलवाता हूँ. मुख्य किरदार मे हैं बिज़्ज़ी पांडे. जैसा की नाम से ही प्रतीत होता है की जनाब ज़रा व्यस्त रहते हैं. भाई आख़िर 'ला'(law) जो कर रहे हैं. "पापा की कसम हम बता रहे हैं (इनका तकिया कलाम) ये बड़े ही दिलचस्प आदमी हैं". इनकी एक प्रेमिका भी है, नाम है सुरीली. लेकिन अफ़सोस बेचारी बोल नही सकती है. लेकिन बिज़्ज़ी पांडे को उनकी 'आयो मायो' में जो आनंद आता है वो तो उन्हें लता जी के गानों में भी नहीं आता. लेकिन बेचारे सुरीली की माता जी से परेशान रहते हैं. अब क्या है की वो इन्हें सुरीली के पास फटकने जो नहीं देती हैं. खैर बिज़्ज़ी पांडे अपने इन कारनामों में ही व्यस्त हैं. देखिए क्या होता है.....

एक और परिवार है यहाँ मुकुन्दी लाल गुप्ता जी का. बड़े भले आदमी हैं बेचारे. बस थोड़ा सा अपनी पत्नी की बकबक से परेशान रहते हैं. इनके सुपुत्र का नाम है चुकुन्दी लाल. अपनी माँ की तरह ये भी सवाल बहुत करता है. लेकिन मिला जुला के बहुत ही प्यारा परिवार है इनका.

हाँ एक अहम किरदार और है कछुआ चाचा का. ये एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति है जिनकी शादी नही हुई है. "किसी किसी की नहीं भी होती है". अब आप बोलेंगे की मुकुन्दी बाबू की शादी तो हो गयी है. "किसी किसी की हो भी जाती है". दरअसल ये इनका तकिया कलाम है. अंदर की बात है की इन्हे भी किसी से इश्क़ हुआ था अपने ज़माने में लेकिन बेचारे की भेजी हुई चिट्ठी(प्रेम पत्र) अभी तक रास्ते मे ही है, और ये इंतेज़ार में ही हैं.

कभी मौका मिले तो एक बार देखने की कोशिश कीजिएगा, "पापा की कसम हम बता रहे हैं बहुत मज़ा आएगा."

Friday, August 14, 2009

सुंदर सुभूमि भैया भारत के देसवा से.......

आज एक भोजपुरी गीत सुनिए. मुझे पता है कि ये लाइन पढ़ते ही कई लोग सोचेंगे कि आज बेकार ही ये ब्लॉग पढ़ने के लिए आ गये. अब ये मुझे भोजपुरी के गाने सुनवाएगा. लेकिन मेरी गुज़ारिश है की एक बार आप इसे सुन लें उसके बाद अपनी प्रतिक्रिया दें.
width="150" height="40" autostart="false" loop="false">

Sunday, June 28, 2009

दिवस

अभी कुछ दिनों पहले फादर्स डे और मदर्स डे गुज़रा है. और शुक्र है की गुज़र गया. मेरे कुछ दोस्तों ने तो परेशान कर दिया था भाई. "अरे अभिजीत भाई आज तो फादर्स डे है घर पे फोन किया की नहीं, कुछ गिफ्ट भेजा की नहीं". कमाल है भाई.... मुझे तो ये कोई भी दिवस मनाने का फंडा ही समझ मे नही आता है. मैं ये नही कहता कि ये सारे दिवस बेमानी हैं. लेकिन लोग इसे जिस तरह से मनाते हैं वो मुझे कुछ हज़म नहीं होता है. सबसे बड़ा उदाहरण तो अपने राष्ट्रीय पर्वों का ही है. अगर मोटे तौर पर बात की जाए तो हम अपने राष्ट्रीय त्योहारों पर क्या करते हैं... सुबह उठे , नहा-धो कर अपने कार्यालय या विद्यालय गये , झंडे को सलामी दी , राष्ट्र गान गाया , मिठाई खाई और वापस अपनी दिनचर्या(मेरा मतलब है छुट्टी वाली दिनचर्या से है) पे लौट गये. आख़िर इसी बहाने एक छुट्टी तो मिली है ना तो उसका तो भरपूर फ़ायदा तो उठना ही पड़ेगा. बहुत इमोशनल हुए तो तीन चार देशभक्ति गीत सुन लिए और सीना चौड़ा किए हुए निकल गये सिनेमा हॉल. अगर दुर्भाग्य से किसी तथाकथित बुद्धिजीवियों की टोली में फँस गये तो एक मस्त सा लेक्चर दे दिया. ये बात अलग है की लेक्चर में कही गयीं बातें लेक्चर तक ही सीमित होती हैं. उसका रोज़मर्रा की ज़िंदगी मे असर सिफ़र ही रहा है. मुझे लगता है की ये फादर्स डे और मदर्स डे का जो चलन है वो किसी ऐसे व्यक्ति ने निकाला होगा जो साल मे एक बार कम से कम अपने माता-पिता को ज़रूर मिस करता होगा. कम से कम इस बहाने उसके माता पिता तो उसे याद आते ही होंगे और इस दिन वो पूरे साल की कसर निकाल लेता होगा. वैसे ही जैसे लोग कहते हैं की चाहे जितना भी पाप किया हो एक बार गंगा जी मे डुबकी लगाली तो सारे पाप धुल जाएँगे. वैसे एक तरह से ये अच्छा भी है. ना से हाँ तो फिर भी ठीक ही होता है. लेकिन मैं अपने आप को एक दिवस में बाँधने मे विश्वास नहीं रखता हूँ. मेरी इस पोस्ट का मतलब ये नहीं है की मैं किसी भी तरह के समारोह या उत्सव का विरोध कर रहा हूँ, बल्कि मेरा उद्देश्य ये है की हम कुछ भी करें किसी भी तरीके से किसी दिवस को मनाएँ, लेकिन अगर हम उसके मर्म को समझ नहीं पाएँगे तो इस तरह के आडंबर का कोई मतलब नही है. और मेरे ख्याल से इसे किसी ख़ास दिन नहीं बल्कि हमेशा अपने साथ रखना होगा. हाँ हम उस ख़ास दिन ये आकलन कर सकते हैं कि हम जिस भावना से इस दिवस को मना रहे हैं वो हमारे साथ रहा है या ये सिर्फ़ किस एक दिन का उद्गार है......

Wednesday, May 27, 2009

प्रतिक्रिया

बहुत व्यथा होती है... और ये इसलिए की ऐसा बार बार होता है. सबसे ताज़ा घटना पंजाब की है. ऑस्ट्रिया में कोई घटना होती है तो उसकी लपट में पंजाब जलता है. पुलिसवालों का कहना है की कुल मिलाकर हिंसा की 86 वारदातें हुई है पंजाब मे. प्रदर्शन करने वालों ने जालंधर में जम्मू-कन्याकुमारी एक्सप्रेस के 4 डब्बों को जला डाला. उसमे सफ़र करने वाले लोग किसी तरह अपनी जान बचा पाए. मेरा प्रश्न ये है कि जो घटना विएना में हुई है उसके लिए भारत में प्रदर्शन करने का क्या तुक है? क्या यहाँ के लोग उस घटना के दोषी हैं? अगर नहीं तो यहाँ के लोग उसकी तपिश क्यूँ झेलें? गृहमंत्री जी का बयान आया है कि " पंजाब में जो कुछ हो रहा है, वो विएना की घटना की प्रतिक्रिया है और हमारा वहाँ की घटना पे कोई नियंत्रण नही है." ये बात या तो लोग समझना नहीं चाहते हैं या समझ कर भी अंजान बने हुए हैं. लेकिन ये कब तक चलेगा? कब तक लोग अपनी ज़िंदगी को किसी सरफिरे की खैरात समझ कर जीते रहेंगें. मेरी समझ में तो ये नही आता है कि आख़िर ट्रेन और बसों को जलाकर उन्हें कौन सा समाधान मिल जाता है? मैं तो ये मानता हूँ कि ये सारे घृणित काम ऐसे लोग सिर्फ़ अपनी उपस्थिति दर्ज करने के लिए करते हैं. उन्हें बस एक मौका चाहिए ये बताने के लिए कि हाँ भाई हम भी अपना अस्तित्व रखते हैं. अब इसके लिए उन्हें चाहे जो करना पड़े. वरना मेरी समझ मे तो ये नही आता कि ऐसी प्रतिक्रिया का क्या तात्पर्य हो सकता है?

Saturday, May 23, 2009

चुनाव

अभी कुछ दिन पहले ही विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र का आम चुनाव समाप्त हुआ. बहुत मायने मे ये चुनाव एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है. पिछले लगभग 15 सालों से हम अपने देश में गठबंधन की सरकार देखते आ रहे हैं. इस बार भी गठबंधन की सरकार ही रहेगी, लेकिन इस बार इसकी संरचना थोड़ी अलग होने वाली है. अलग इस मामले में की इस बार मुख्य दल एक टॅशन मे रहेगी. इसका प्रमाण हम देख भी रहे हैं. और मेरे ख़याल से ये अच्छा भी है. खैर मैं ये काम उन पे ही छोड़ देता हूं. इस बार के चुनाव परिणाम को देखकर बहुत ही सुखद आश्चर्य का अनुभव होता है. ख़ासकर बिहार के परिणाम को देखकर. मन बहुत प्रसन्न हुआ. ऐसा इसलिए नहीं की मैं किसी दल विशेष को पसंद करता हूं. बल्कि मेरी प्रसन्नता की वजह है बिहार के लोगों के सोच में परिवर्तन. हमारे यहाँ एक कहावत है (थी )की " वोट और बेटी दूसरे जात मे नही दी जाती है". और दुर्भाग्य से अभी तक इसका अक्षरशः पालन होता आया है. लेकिन इस बार का चुनाव परिणाम इस मिथक को तोड़ता हुआ प्रतीत होता है. जो की काफ़ी सुखद है.इस बार लोगों ने विकास को मुद्दा बनाया है. लगता है की लोग अब जाग गये हैं और उन्होने भी जात-पात से उपर उठकर सोचना शुरू कर दिया है. और ये लहर सिर्फ़ कुछ क्षेत्रों मे ही सीमित नही है बल्कि ये पूरे प्रदेश में विस्तृत है. आशा करता हूँ कि ये समझ लोगों मे अब हमेशा रहेगी और लोग हमेशा ही समाज की बेहतरी को सोच समझ कर ही अपना कीमती मत प्रयोग मे लाएँगे. मैने जब इस बार के नामांकन पे ध्यान दिया तो मुझे दो बात अच्छी नही लगीं. एक तो ये की एक उम्मीदवार एक से ज़्यादा जगह से अपना नामांकन कर सकता है. जैसे की लालू जी ने दो जगह से अपना नामांकन दाखिल किया था. इनमे से एक जगह से वो हार गये. लेकिन अगर वो दोनो जगह से जीत जाते तो किसी एक सीट को उन्हे छोड़ना पड़ता और उस सीट के लिए फिर से चुनाव कराए जाते. इसका मतलब अतिरिक्त खर्च, और इसके लिए ज़िम्मेदार कौन है? दूसरी बात भी इसी से संबंधित है. वो ये की जो लोग वर्तमान मे विधान सभा के सदस्य हैं वो भी लोकसभा मे चुनाव लड़ सकते हैं. और अगर वो जीत गये तो विधान सभा की वो सीट खाली हो जाएगी और वहाँ भी नये सिरे से चुनाव करवाए जाएँगे. अकेले बिहार मे ऐसे लगभग 14 उम्मीदवार हैं. पूरे देश मे पता नही कितने लोग ऐसे होंगे. मेरे सुझाव मे क़ानून बनाकर ये दोनो तरीके ख़त्म करवा देना चाहिए. आप क्या सोचते हैं?