Thursday, May 7, 2009

मैं रोया परदेस में

आज मैं आपको एक कविता सुनाना चाहता हूँ जो मुझे अच्छी लगती हैं. आशा करता हूँ आपको भी ये पसंद आएगी. पहली कविता निदा फ़ाज़ली ने लिखी है और इसके गायक जगजीत सिंह है. इस कविता की ख़ासियत ये है की ये सुनने मे बहुत ही सरल है लेकिन अगर आप इसके अर्थ की गहराइयों मे उतरेंगे तो खो जाएँगे....

 

मैं रोया परदेस में, भीगा माँ का प्यार, 

दुख ने दुख से बात की, बिन चिट्ठी बिन तार.

 

छोटा कर के देखिए, जीवन का विस्तार 

आँखो भर आकाश है, बाहों भर संसार.

 

ले के तन के नाप को घूमे बस्ती-गाँव 

हर चादर के घेर से बाहर निकले पाँव

 

सब की पूजा एक सी, अलग अलग हर रीत, 

मस्जिद जाए मौलवी, कोयल गाए गीत.

 

पूजा-घर में मूर्ति,मीरा के संग श्याम 

जितनी जिसकी चाकरी, उतने उसके दाम.

 

नादिया सीँचे खेत को, तोता कुतरे आम 

सूरज ठेकेदार सा, सबको बाँटे काम.

 

सातो दिन भगवान के, क्या मंगल क्या पीर 

जिस दिन सोए देर तक, भूखा रहे फकीर.

 

अच्छी संगत बैठ के, सांगी बदले रूप 

जैसे मिल कर आम से, मीठी हो गयी धूप 

 

सपना झरना नींद का, जागी आँखें प्यास 

पाना-खोना- खोजना, साँसों का इतिहास


चाहे गीता बांचिए या पढ़िए क़ुरान मेरा तेरा प्यार ही हर पुस्तक का ज्ञान


बच्चा बोला देख के मस्जिद आलीशान 

अल्लाह तेरे एक को इतना बड़ा मकान

 

मंदिर के अंदर चढ़े घी-पूरी-मिष्ठान्न 

मंदिर के बाहर खड़ा ईश्वर माँगे दान 

 

मैं था अपने खेत में तुझको भी था काम 

मेरी तेरी भूल का राजा पड़ गया नाम 

 

जादू-टोना रोज़ का, बच्चों का व्यवहार 

छोटी सी एक गेंद में, भर दे सब संसार.

 

"सा" से "नि" तक सात सुर, सात सुरों का राग 

उतना ही संगीत तुझमे, जितनी तुझमे आग 

 

सीधा-सादा डाकिया, जादू करे महान 

एक ही थैले में भरे, आँसू और मुस्कान.

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